बिजली रा दुखड़ा

कड़कती धूप,आभै सूं बरसे अंगारा,

पंखो चालै कोनी, हाल बेहाल है म्हारा।

पसीनै सूं लथपथ होग्यो म्हारो गाम,

ओ कालजै री कोर,कदै मिलसी आराम?

​कदै आवै, कदै जावै, इणरी माया भारी,

बिना लाइट री आ रात, लागे सबसु खारी।

छत पै जावां तो मच्छर खावै, नीचै लागै लू,

हे भगवान!अब थे ही बताओ,म्हे कीस्यू करा पुकार ?

तभी अचानक  बिजली आगी,राजी हूँगी नार,

टाबरिया राजी होया,जगमग होग्या संसार।

पण ओ सुख थोड़ो ही हो, पाछी झपकी खायगी,

आवै जकी तो ठीक है,पण आसी-ज्यासी लायगी!

मोबाइल री बैटरी रोवै, इनवर्टर भी करै कूं-कूं,

लाइट री इण आंख-मिचौली सूं,म्हे तो थारोड़ो हूं।

बैठ्या-बैठ्या बीझणो डुलावां, देवा बत्ती नै गाल,

हे बिजली माता! आ भी थारी कोई  है बात भलां?

जेठ-असाढ री बलती दुपेरी, सूरज उगलै आग,

लाइट आधी रात नै भागी,फूट गया म्हारो भाग।

कमरा बण्या तंदूर सा, कोनी आवै चैन,

काली-बोली रात में, रोवै म्हारो नैण।

पसीनो टपकै धार-धार, जीवड़ो घबरावै,

इण बिजली री आंख-मिचौली, मन्ने घणी सतावै।

बालक रोवै नींद में,बूढ़ा करै पुकार,

हे बिजली रा साहिबा! मत करो इत्तो अत्याचार।

कदै लागै आ आवेगी, मन में बंधै आस,

एक मिंट आ'र पाछी जावै,कर ज्यावै बिस्वास।

इनवर्टर भी बोलग्यो,जीव रा दुखड़ा खोल्गया,

बीझणो लै'र हाथ में,जोवां थारी बाट।

आवै तो थारो स्वागत है,जावै तो म्हारो भाग,

बिना थारे ओ बिजली माता,कड़ैई नी मिलसी सुख।

अब तो मेहरबानी करो, राखो म्हारो मान,

आजा म्हारी लाडली,मत काढ़ो म्हारो प्राण!

                    शंकर नाथ जाखड़,धीरदेसर 


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