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श्रावणी-बेला

मेघा आए दूर से  आकाशा मंडराय  रिमझिम रिमझिम बरसे मेघ तृप्त धरा हरसाय  कृषक बोए खेत को  हीरा मोती प्रकटाए  बदरा बरसे खेत में  हरियाली बढ़ जाए  झूम उठे चिंतित कृषक भी जब  श्रावणी बूंद गिर जाए  चमक उठे हर चेहरा भी जब  श्रावणी घटा चहु दिसि छाए  बूंद पड़े जब बगिया में  हर कलियां हरषाय  पीक-शिखी के मुग्ध मौन मे    श्रावणी मधु बस जाए चहुदिशी नृत्य हरषित शिखी का  सतरंगी नृत्य दिखाय श्रावण है श्रृंगार धरा का  कली-कली खिल जाए मेघा बरसे जोर से जब  धरा मंद-मंद मुस्काए  अमृत बूंद के मिश्री घोल से  वातावरण रसीला हो जाए शंकर नाथ (व.अध्यापक,हिंदी)

मैं समय हूं।(कविता)

🕒🕒🕒🕒🕒 मैं समय हूं मैं निरंतर चलता हूं कभी रुकता नहीं कभी झुकता नही कभी थकता नहीं..... एक ही गति है मेरी कभी ठहरा सा लगता हूं तो कभी भागता प्रतीक होता हूं। कभी सुख के साथ तो कभी दुख के साथ कभी हंसाता हूं तो कभी रुलाता हूं मै ही तुझे जगाता हूं मैं ही तो तुझे सुलाता हूं मेरी कीमत मैं नहीं जानता जानने वाला भी तू ही है कभी तू मुझे भगाता है तो कभी मैं तुझे भगाता हूं। कभी मोहमाया के जाल में फंसाता हूं। न तो कोई मेरी गति समझ पाया और नहीं मेरा कोई कर्म मैं देखता हूं कि इस संसार में मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो इस सांसारिक मोह माया के जाल में फंस जाता है और मछली की तरह छटपटाता है। यह उनके बुरे कर्मों का ही प्रतिफल है। यह अभिशाप ही उनका परिणाम है हे मानव प्राणी.... अभी भी मैं यही रुका हूं तू मुझे समझ तू मेरे साथ चल तेरा कल्याण होगा।     शंकर नाथ धीरदेसर       वरिष्ठ अध्यापक

कश्मीरी-केसर

कश्मीरी-केसर उठा घाटी का कण कण चमक उठी केसर की रसधार है जन्नती हिमानी की घाटी में बर्फानी हवा की बहार है  थिरक  रही सूरज की किरणें  गूंज उठा डल में राग मल्हार है  उच्च हिमालय मुकुट बना है  वहा शिव की गंगा -धार है  अमरनाथ की प्यारी यात्रा  उसमें भोले का जयकार है  दमक उठा घाटी का पत्थर  अब पत्थर प्यार का पैगाम है  पत्थर गिरा के, पुस्तक उठा के  विद्यालय जाता हर परिवार है  अमन ,शांति फैली है घाटी में हर कश्मीरी गाता राग मल्हार  बोल उठा कश्मीरी बालक  जग मे भारत देश महान है   कश्मीरी केसर की क्यारी  केसर की फैली बहार है  जाग उठा कश्मीरी जन-जन  भारत मां का जय जयकार है                 शंकर नाथ.....

" सावन "

सावन हरे हरे ये खेत सावन में भीगी रेत किसान का वर्षा-हेत उड़ते धवल-हंसों की रेख सब सावन की कहानी बयां करते है। मोर-पपैया का राग नन्हे पौधे पर पराग नववधू का कांत-राग पानी से भरा तालाब उसके किनारे उगी घास सब सावन की कहानी बयां करते हैं। पेड़ पर लटका झूला सावन का रंग सुरीला चिंटी का खेल हठिला कोयल का बोल रसीला सब सावन की कहानी बयां करते हैं। खेतो में जुते बैल पशुओं की रेलम- रेल बच्चों का किश्ती-खेल कीट पतंगों की चहल सब सावन की कहानी बयां करते हैं ।                 शंकर नाथ, धीरदेसर                    व.अ.(हिन्दी)              रा बा मा वि -अलीपुरा(अजमेर)          

मेघा नीर बरसाए

चित्र
                 "मेघा नीर बरसाए" मोर जंगल में पंख लहरावे  पपैया सावन में शोर मचाए  उमड़- घुमड़ कर मेघा आये  मेघा झमाझम नीर बरसाए                         इंद्र नाचे समुन्द्र लहराए                         घूम -घूमकर मेघा आए                        प्यारी कोयल सावन गाए                         मेघा झमाझम नीर बरसाए  दुखी अन्नदाता पुकार लगाएं  समुद्र में लहरें सावन गाए  चारो दिशा से मेघा आए मेघा झमाझम नीर बरसाए                       नन्ही कलियां प्यासी मुरझाए                       इंद्र क्रोध में हुकुम चलाएं    ...

"सावन की बहार"

सावन की रिमझिम बरसा में , जन जीवन में खुशियां छायेगी। मानव के जीने की उमंग , बहारों की याद दिलाएगी। उमंग के पक्षी सावन में,  बहारों के रंग खिलाएंगे । आशा के पक्षी सावन में,  जीवन का बीज लगाएंगे। बच्चों के सपने सावन में, किश्ती का खेल दिखाएंगे।  बच्चों की किलकारी सावन में, बंसी की राग सुनाएगी। फूलों की सुगंध सावन में,  जीवन की खुशबू फैलायेगी।  बिजली की चमक सावन में,  सर्कस का खेल दिखाएगी। बादल की रिमझिम सावन में,  कलियों में खुशियां छाएगी।  खेतों के समतल आंगन में,  फसलें प्यार की लहर आएगी।                    शंकर नाथ जाखड़ धीरदेसर हनुमानगढ़ 

"श्रावणी-समीर"

"श्रावणी-समीर"     तपती धरती की सांसो में, मेघा ने नीर संचार किया। मोर पपैया की आंखों में, श्रावण स्वप्न साकार हुआ। कृषक की प्यासी निगाहों में, आशा का दीप साकार हुआ, प्यासी कोयल की रागों में, नई रागों का संचार हुआ। मरुभूमि की प्यासी रेत में ठंडी हवा का संचार हुआ खाली तालाबों के पैदों में ठंडे नीर का बहाव हुआ गोपालक के सुखे खेतों में हरी घास का उद्भव हुआ उपवनों की क्यारी में नए फूलों का उगाव हुआ जेठ से झुलसे पेड़ों में नए पत्तों का उगाव हुआ सूखे कुऔं के पातालों में नए जल का भरा हुआ जंगल की जलती मृगतृष्णा में श्रावण- लहरी का संचार हुआ जन की प्यासी आशा में शिव ने सपना साकार किया जग के प्यासे सपनों में इंद्र ने मेघा नीर भरा गांवों की गहरी निराशा में इंद्र ने आशा संचार किया  जन जन की प्यासी आखों में श्रावण लहरी का उपकार हुआ।                    शंकर नाथ धीरदेसर   

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