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जिंदगी की ख्वाहिश

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आहिस्ता चल ए जिंदगी,अभी   शिक्षा की अलख जगाना बाकी है    शिक्षक हूं..... शिक्षक का फर्ज निभाना बाकी है  भारत भूमि पर जन्मा हूं  भारत मां का कर्ज चुकाना बाकी है  आहिस्ता चल ए जिंदगी, अभी  शिक्षा की अलख जगाना बाकी है  जन-जन की ख्वाहिशें अभी अधूरी है  अधूरी पड़ी ..... ख्वाहिशों को पूरा करना जरूरी है  गरीबी में पला बढ़ा हूं  गरीबी को मिटाना बहुत अभी जरूरी है  आहिस्ता चल ए जिंदगी,अभी  शिक्षा की अलख जगाना बाकी है  मां के आंचल में पला बढ़ा हूं  मां के दूध का फर्ज निभाना बाकी है  आहिस्ता चल ए जिंदगी,अभी   शिक्षा की अलख जगाना बाकी है अनपढ़,निरक्षर को,अभी  ज्ञान का दीप जाना बाकी है  आहिस्ता चल ए जिंदगी,अभी  शिक्षा की अलख जगाना बाकी है  युवा का सपना अभी अधूरा है  अधूरे सपनों को पूरा करना बाकी है  आहिस्ता चल ए जिंदगी अभी  शिक्षा की अलख जगाना बाकी है

बादळी (कविता)

बादळी हवा में लहराती वो  बिना पंख के भी उड़ जाती वो  यायावरी से मदमाती वो  जीवन में सतरंगी खेल दिखाती वो  सावन में इसका रूप निराला  लगती वो रूपवती बाला  कहीं प्यार से तो  कहीं क्रोध में बरसती वो   श्रावण में नृत्यांगना सी वो कृषक के मनभाती वो  कभी पहाड़ पर तो कभी  मरुस्थल में चली जाती वो  जहां भी जाती सुंदर दृश्य दिखलाती वो  श्रावण की प्यारी बादळी कृषक की दुलारी बादळी जन मन को हरषाती बादळी ☁☁☁☁☁☁ लेखक:- शंकर नाथ जाखड़,धीरदेसर 

हिन्दी कविता

हिंदी मेरा तन हिंदी मेरा मन  हिंदी ही मेरा मनन ❤❤ हिंदी मेरा ज्ञान  हिंदी मेरा सम्मान  हिंदी ही मेरा स्वाभिमान  ❤❤❤

भारत के अन्नदाता (कविता)

भारत के अन्नदाता 🌿🌴🌴🌴🌿🌾🌿  तू मीत,सखा सहोदर हो हो नृप, भूप विधाता तुम हो हो जग के तारणहार, दीनदयाल भरता पेट सकल संसार सब तुम बांध गांठ पेट के खुद जग सेवा मे निस्वार्थ भाव से लगै हो देश सेवा में हे भूस्वामी नमन,वंदन,अभिनदन तूम को गर्व ग्लानि, मति मोहे मरण त्याग सभी तुम मन मस्त,है लगन,मेहनत करते तुम हो धन्य जगत जननी मात तुम्ही को हे विधाता,अन्नदाता नमन तुम्ही को, वंदन तुम्ही को

कविता की विशेषता

कविता की विशेषता जीवन का उद्गार है कविता जीवन की अनुभूति का समाहार है कविता  सुख-दुख के भावें का श्रृंगार है कविता सत्य की अनुभूति के अनुसार है कवि ता कवि-कल्पना की भरमार है कविता  कवि हृदय की अंकुर का प्रभाव है कविता जनसाधारण पर असरदार है कविता कवि के कलम की मीठी धार है कविता छंद बद्ध रसों से सरोबार है कविता  अलंकारों से अलंकृत है कविता सामाजिक समस्या पर वार है कविता सामाजिक मूल्यों की रसधार है कविता  यति,गति,लय,ताल के अनुसार है कविता तुकबंदी के क्रमानुसार है कविता

कोरोना महामारी,(कविता)

फैली कोरोना महामारी यह खतरनाक है बीमारी। करती विश्व को प्रलयकारी। चाइना है इसका महतारी न दवा न कोई उपचारी छुआछूत की यह बीमारी दो गज की दुरी,रखना है जरुरी  घर में ही रहना है सबकी है मजबुरी कोरोना वैक्सीन है अभी अधूरी इसलिए सावधानी रखो सब पूरी मास्क पहनना है सबको जरूरी सकल जगत मे हाहाकारी मानवता पर हावी बीमारी जग की हालत विनाशकारी भयभीत है दुनिया सारी

मैं समय हूं।(कविता)

🕒🕒🕒🕒🕒 मैं समय हूं मैं निरंतर चलता हूं कभी रुकता नहीं कभी झुकता नही कभी थकता नहीं..... एक ही गति है मेरी कभी ठहरा सा लगता हूं तो कभी भागता प्रतीक होता हूं। कभी सुख के साथ तो कभी दुख के साथ कभी हंसाता हूं तो कभी रुलाता हूं मै ही तुझे जगाता हूं मैं ही तो तुझे सुलाता हूं मेरी कीमत मैं नहीं जानता जानने वाला भी तू ही है कभी तू मुझे भगाता है तो कभी मैं तुझे भगाता हूं। कभी मोहमाया के जाल में फंसाता हूं। न तो कोई मेरी गति समझ पाया और नहीं मेरा कोई कर्म मैं देखता हूं कि इस संसार में मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो इस सांसारिक मोह माया के जाल में फंस जाता है और मछली की तरह छटपटाता है। यह उनके बुरे कर्मों का ही प्रतिफल है। यह अभिशाप ही उनका परिणाम है हे मानव प्राणी.... अभी भी मैं यही रुका हूं तू मुझे समझ तू मेरे साथ चल तेरा कल्याण होगा।     शंकर नाथ धीरदेसर       वरिष्ठ अध्यापक

मरुवाणी(कविता)

मरुवाणी(कविता) ऊंचे रेत के टीलों पर पेड़ नहीं लगते पौधे नहीं उगते न ही घास लहलहाती है। उठते हैं तो सिर्फ धूल के गुबार। जो आसमान में उठते हैं उसको बदरंग कर देते हैं और चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा छा जाता है। यह दृश्य हैं जेठ के महीने का। जिसमें सब प्राणी त्राहिमाम करते हैं। उसके बाद......... ⛈⛈⛈⛈⛈ जब आती है वर्षा ऋतु तो चारों तरफ घनघोर घटाएं छा जाती है आसमान मे मानो बाढ आ गई हो कड़कती है बिजली और बरसते है बादल तो मरु मे महकार आ जाती है खुश होते हैं हलदर और उसके बैल खुश होती है मरूधरा तो खुशबू मिट्टी की चारों तरफ फैल जाती है लहलाती है फसलें तो ऐसा लगता है मानो मरूवण ने हरियाली चुनर ओढ ली हो और मरुधर में बहार आ गई हो खुश होते पशु-पक्षी तो मरू मे जीवन की रसधार आ जाती है

कोरोना को हराना(कविता)

जगत में फैला कोरोना आ रही है मुश्किले, पर इससे डरो-ना मुंह पर मास्क, हाथ भी धोना है। कोरोना है,कोरोना इसे बिल्कुल भी डरो ना डरो ना पर,लापरवाह नही होना है कोरोना है,कोरोना !जगत से इसे मिटाना है  मिल सभी को कोरोना को धोना है विश्व में फैली महामारी इसी का तो रोना है हाथ मिलाना नहीं,नमस्ते ही करना है हाथ साबुन डिटोल से ही धोना है डरो मत,कोरोना को ही तो धोना है भारत भूमि की पावन धरा से समूल कोरोना को मिटोना है। हम भारत की संतान हैं आतंक,नक्सलवाद से भी लड़े हैं, यह तो सिर्फ कोरोना है हम मिलकर इसे भगाएंगे कोरोना को भारत से मिटायेंगे।               Shankar nath               Hanumangarh

फाल्गुनी-आभा(कविता)

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🌄🌄🌄🌄🌄 अंग के रंग लगाई के मन मे बहुत उमंग अंग अंग में रंग लगत है हृदय बही तरंग। हर्षित-जनों की देख खुशी वसुधा रंगी बहुरंग चंग की मृदंग बजत सतरंगी स्वर उठत रगरसिया नचत पग पायल बजत रसिका ठुमक-ठुमक चलत हियरा संग-संग नचत होली की हुड़दंग मे अपने के संग मे रंग गुलाल अबीर के संग मे संतरंगी आभा फागुन की

जाग मुसाफिर जाग(कविता)

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जाग मुसाफिर जाग जाग मुसाफिर जाग तेरे जगने की है आस क्यों है तू इतना निराश दिनों-दिन होता हताश जाग मुसाफिर जाग क्या तुमने पाया जग में क्या तुमने खोया मग मे क्यों है इतना उदास जाग मुसाफिर जाग क्या विपत्ति है तुम पर आई क्यों इतना घबराया है भाई क्या समस्या है तुझ पर छाई जाग मुसाफिर जाग जग में आया कुछ नहीं पाया आलस में है घर बनाया फिर कहता है- कुछ नहीं पाया जाग मुसाफिर जाग 🏃🏃🏃🏃🏃 जब-जब है तू दौड़ा संयम का साथ है छोड़ा आत्मविश्वास को नही जोडा़ इसलिए जीवन का रूख है मोड़ा जाग मुसाफिर जाग उम्मीद न टूटे, हौसला न छूटे आत्मविश्वास के सहारे जीवन का रूप संवारे जाग मुसाफिर जाग बैसाखियां छोड़ बहाने की आदतें छोड़ पुराने जमाने की आत्मबल से चलना सीख जाग मुसाफिर जाग दर्द बहुत है जमाने में हौसला रख ले तू कमाने में कोई हारा है कोई बेसहारा है पर निखरा वही जो चलनवारा है जाग मुसाफिर जाग देख हौसला चिंटी का दीवार पर चढ़ती है हजारों बार गिरती है कोशिश बेकार नहीं जाती है आखिर सफलता की सीढ़ी पर चढ़ जाती है जाग मुसाफिर जाग अंगारों पर चलना होगा तूफानों से ट...

शीत-ऋतु

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शीत-ऋतु थी,कंपकंपता प्रदेश पल-पल कंम्पित प्रकृति-परिवेश बर्फिली हवा की रफ्तार चुबती सकल संसार बढता धुंध का गुब्बार चकित जनसमुह बार-बार करता जन-जन हाहाकार था हिमालय भी कुपित बढता बर्फ का विस्तार अपने शीत-पिड़ित-दृग फार लपेटे लाव-लश्कर किरणे सहित चकित दिनकर भी दक्षिण मे प्रस्थान शिशिरांशु की चन्द्रिका शीतल शीतज्वर सा शीतकर को चहुदिशी शीतलता प्रखर शीततरंग है भूतल पर मणिक सरिस बुन्दे ओस की विस्तारित सकल भूतल पर स्वर्णिक बुन्दे है फसल रबी पर शीत से पिड़ित जन है, कुंठित मन-बदन  अलाव से तपता तन है, निगौड़ी शीत  मनुज पर रख प्रीत....🖋🖋 Shankar nath

"सरस्वती-सदन"(कविता)

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"सरस्वती-सदन"(कविता) विद्यादायिनी का वरदान सदन में शिक्षा की बहती रसधार वतन में माता-पिता जैसा व्यवहार सदन मे बच्चों को मिलता प्यार जगत में एमडीएम का मिट्ठा स्वाद सदन में बच्चो के सर्वांगीण विकास बदन मे प्रार्थना सभा में संगीत सदन में बच्चों का लहराता राग गगन में गुरुजनों का आशीर्वाद सदन में संस्कारों का गुणगान मनन में अनुशासन का सम्मान सदन में अध्यापकों का फैला प्यार चमन में गुरु-शिष्य संम्बन्धो की प्रगाढता सदन में सब रिश्तो का आदरभाव ज़हन में पुस्तकों का आदर-भाव सदन में गुणीजनों का गुणगान है उनमे     शंकर नाथ हनुमानगढ़             

किसान के अधूरे सपने(कविता)

किसान के अधूरे सपने(कविता) 👉सोचा था मां-बाप के पद-चिन्ह पर चलूं खेती करू,बच्चों को पढ़ाऊ पत्नी के गहने बनवाऊ बेटे की ख्वाहिश थी ... पापा-मैं नौकरी करूं उच्च-शिक्षण संस्थान में पढ़ू परंतु मैं बेटे की उस इच्छा को पूरा न कर सका बेटी की ख्वाहिश थी पापा-मैं कॉलेज जाऊंगी पढ़ लिखकर कामयाब बनूंगी अफसोस!बेटी के ख्वाब को भी पूरा न कर सका पत्नी की ख्वाहिश थी उनके मां बाप गरीब थे,गहने न बनवा सके पत्नी की अभिलाषा थी,गहने बनवाऊं परंतु पत्नी के ख्वाब को भी पुरा न कर सका जिंदगी में खूब मेहनत की,सपने देखे इसके के लिए जीवन को दांव पर लगा दिया ख्वाहिशें मेरी और मेरे परिवार जनों की अफसोस! उनकी ख्वाहिश पुरी न कर सका सोचा था कुछ नया करूंगा परंतु .......... किसी का भी साथ नहीं मिला धिक्कार है ऐसे जीवन को जो हमेशा पीसा जाता है इसमें न तो ख्वाहिशें और न ही सपने पुरे होते कभी साहूकार कोसते हैं तो कभी बंटाईदार कोसते है अंत में सोचा की सरकार की 'किसान सम्मान निधि'लाभ देगी परंतु वह भी 'ऊंट के मुंह में जीरा ' जीवन में खूब दौड़ा,भागा की दो जून की रोटी का प्र...

" गरीब किसान का दर्द"

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घर में .................. एक गाय थी ......... उसने चारे के अभाव में लात मार दी भटकता रहा उस चारे की खोज में न चारा ला सका और न ही दुधधारा बहा सका घर में ..................... एक बूढ़ी मां थी......... आंखों से अंधी,बीमारी से जकड़ी हुई भटकता रहा मां की दवाई की खोज में न दवा ला सका और न ही मां को बचा सका घर में............... एक बकरी और उसके दो सुंदर बच्चे थे.. सोचा बच्चे बड़े होंगे और बकरी दुध देगी न हीं बकरी ने दूध दिया न हीं बच्चे बड़े हुए घर में...................... एक बच्चा था........... सोचा था बच्चे को पढ़ाउगां,शिक्षित बनाउगां मैं न बच्चे को पढा सका और न ही शिक्षित बना सका घर मे......... एक सहधर्मचारिणी थी....... न प्यार,न सेवा,न जीवन की उलझन बता सका सात जन्मों के साथ का वादा नही निभा सका अंत में वह घर ही....... उस घर मे न मैं रह सका न ही परिवार गरीबी के कारण सबकुछ चला गया न जिदगीं बची न जमीन बचा सका.. .......गरीब किसान........

"हिन्दी भाषा की ताकत"

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हिन्दी भाषा की ताकत भारत का प्रकाश है इसमें जन-जन की पुकार है इसमें भारतीयों का प्यार है इसमें राष्ट्रभाषा की दरकार है इसमें समरसता का सार है इसमें अखंडता का भार है इसमें संस्कारों की भरमार है इसमें चेतना की पुकार है इसमें गरीबों की सरकार है इसमें राष्ट्रप्रेम की दरकार है इसमें संस्कृति की झलक इसमें भ्रातृत्व की भावना है इसमें आर्यों की सद्भावना है इसमें नाथ-सिद्धों की छाप इसमें जैनों-साहित्य की बात है इसमें वीर रस की सौगात है इसमें श्रंगार रस की छाप है इसमें भक्ति  की रसधार है इसमें वात्सल्य का प्यार है इसमें छंदों की भरमार है इसमें व्याकरण की धार है इसमें संस्कृती का प्रचार है इसमें अत्याचारों का प्रतिकार है इसमें प्रेमचंद जैसे कलमकार है इसमें अपभ्रंश का सुधार है इसमें कबीर का विस्तार है इसमें लोक कल्याण का सार है इसमें (14 सितम्बर- हिन्दी दिवस की मंंगलकामनाएं)                   शंकर नाथ,धीरदेसर (हनुमानगढ़)                        वरिष्ठ अध्यापक ...

शिक्षक दिवस

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हमारी सृष्टि की संरचना करने में देवों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है- ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता,विष्णु पालनहार और महेश को सृष्टि का संहारक कहा जाता है। मनुष्य को इस संसार में जीवनयापन करने के लिए आध्यात्मिक और भौतिक दोनों तरह से जीवन यापन करना पड़ता है।आध्यात्मिक स्वरूप को आगे बढ़ाने के लिए उसको एक आध्यात्मिक गुरु की आवश्यकता रहती है और इस भौतिकवादी युग में आगे बढ़ने के लिए एक शिक्षक की आवश्यकता रहती है आज का युग भौतिकवादी युग है अतः अपने जीवन निर्वाह के लिए निजी व्यवसाय,उद्यम कला-कौशलता में निपुणता प्राप्त करने के लिए एक श्रेष्ठ गुरु की आवश्यकता रहती है उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए एक सच्चे,संस्कारवान,दया-भावी, परोपकारी और सहिष्णुता शिक्षक की आवश्यकता रहती है प्राचीन काल में बालक बड़ा होने पर गुरुकुल आश्रम में शिक्षा ग्रहण के लिए भेज दिया जाता था। 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करते थे और उसके बाद ग्रहस्थ जीवन में आते थे ।आश्रम में रहते हुए शिष्य गुरु की सेवा- सुरक्षा करता था ।प्राचीनकाल में शिक्षा का स्वरूप मौखिक था  जब से लेखन सामग्री का...

गांव हमारा सबसे प्यारा

गांव हमारा-सबसे प्यारा हनुमानगढ़ है जिला हमारा गांव 'धीराणा' सबसे न्यारा बालीनाथ जी रक्षक हमारा जन-जन को है देते सहारा जय-जयकार से गूंजे दवारा साफ-सफाई रखते हैं सारे गली गांव है स्वच्छ हमारे बीच गांव में कंवर केसरा हम सबका है वह परमेश्वरा पीपल प्यारे,छांव के सहारे शीतल छांव मे हताई के नजारे गांव उत्तर में स्कूल है हमारा शिक्षा पाते है गांव है सारा मीठी बोली,मीठी है वाणी आदर-भाव से भरपूर है सारे बुड्ढे-बुजुर्ग है दाता हमारे सज्जन पुरूष है लोग हमारे जात-पात का भेद ना हमारे समन्वय भावना रखते सारे माता-बहन है सुखी हमारी घर-घर की है लक्ष्मी है सारी युवा गांव के शान है सारे शिक्षा में है- बाजी मारे हथाई है-गांव की भाईचारा सबको सम्मान,सबको सहारा हरे-भरे हैं खेत हमारे आमदनी का स्रोत है सारे खुली हवा है सुंदर नजारे 'नाथ' शंकर को लगते प्यारे            शंकर नाथ,धीरदेसर हनुमानढ़़ shankarlalnath.blogspot.com 

बच्चे हैं सबसे अच्छे

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छोटे-छोटे बच्चे  दिल के सच्चे बच्चे  बातों के पक्के बच्चे मन के थोड़े कच्चे                                   खेले- कूदे बच्चे                                   शोर मचाए बच्चे                                   सब बच्चे हैं अच्छे                                   रोज पढ़ते हैं बच्चे  नहाए बच्चे,खाए बच्चे  जग को हंसाये बच्चे मंद मंद मुस्काते बच्चे ककहरा गाते बच्चे                                  दादी के पोते बच्चे                          ...

संघर्षी जीवन

मुझे कदम-कदम पर सुख-दुख मिलते हैं दुख सिखाता जीवन कहानी सुख मिटाता जीवन जुबानी मुझे कदम-कदम पर सुख-दुख मिलते हैं सुख जीवन की हानि है दुख सुनाता जीवन कहानी है मुझे कदम कदम पर सुख दुख मिलते हैं सुख में जब सरस इतराता हूं दुख की परिभाषा सुनाता हूं मुझे कदम-कदम पर सुख-दुख मिलते हैं मुझे दुख ने अनुभव ज्ञान दिया सूख ने मिटा कर सब साफ किया मुझे कदम-कदम पर सुख-दुख मिलते हैं जब याद आता है-यह वक्त गुजर जाएगा तो सुख मे दुख और दुख मे सुख का समन्वय मुझे कदम-कदम पर सुख दुख मिलते हैं सुख-दुख में समरसता है सुख-दुख जीवन की कहानी

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