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मोबाइल महाविनाश

  मोबाइल के दुष्परिणाम पर कविता मोबाइल आया जीवन में, लाया संग सुविधा, पर इसका दुरुपयोग बने, अब एक बड़ी विपदा। हर पल बस स्क्रीन पे, नजरें गड़ी रहें, सामने जो हैं पास में, उनसे दूरियाँ बढ़ें। बचपन खो रहा है अब, गेम्स की दुनिया में, कहाँ गए वो खेल खुले, मैदानों की छाया में। माँ-बाप की गोदी छूटी, किताबें भी रूठीं, मोबाइल की जादूगरी ने, नींव तक को लूटी। संध्या की बातों को, अब चैट ने खा लिया, आंखों की रोशनी को, नीली रौशनी ने छीन लिया। रिश्ते हो गए डिजिटल, अपनापन अब कहाँ? दिलों की गर्माहट में, आ गया है अब धुआँ। सोते-जागते मोबाइल, खाने में भी साथ, इंसान अब मशीन बना, छूट गई सौगात। बचो इससे जितना हो, साधन है ये बस, वरना जीवन हो जाएगा, खाली और निष्कलुष।

कितना स्वार्थी है मानव

कितना स्वार्थी है मानव... नदी से पानी नहीं   रेत चाहिए.... पहाड़ से औषधि नहीं पत्थर चाहिए.... पेड़ से छाया नहीं लकड़ी चाहिए...... खेत से अन्न नहीं नकदी फसल चाहिए उलीच ली रेत खोद लिए सब पत्थर काट लिए पेड़ तोड़ दी मेड़ कितना लालची है मानव.. रेत से पक्की सड़क  पत्थर से मकान बनाकर  लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे सजाकर, अब भटक रहा हैं मानव.....!! सूखे कुओं में झाँकते, रीती नदियाँ ताकते, झाड़ियां खोजते लू के थपेड़ों में, बिना छाया के ही हो जाती सुबह से शाम....!!! और गली-गली ढूंढ़ रहे हैं आक्सीजन और भटक रहे छांव की खोज मे.. तपती दुपहरी बदबूदार हवा उजड़ती प्रकृति ओर सब बर्तन खाली सोने के अंडे के लालच में, मानव ने मुर्गी मार डाली !!!, कितना लालची है मानव.....

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