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जंजाळ

 “जंजाल” शायं….. शायं…… दो सितारो का भारी भरकम भार लिए धधकती हूयी गाड़ी रुकती है। सफ़ेद बेल्टधारी युवक सीना ताने गाड़ी के दरवाज़े को खोलकर, 4  फ़ितीयों का भार लिए साहब के सामने हाथ उठाके, देश का जयकारा लगाता है। साहब सिर्फ़ मुंडी हिला कर प्रतिकार करते है।  साहब- कुछ पता चला? इसके बारे में। यह क्यूँ पंखे से लटकर……. सब मौन थे, इस समय ज़िंदा था तो सिर्फ़ फंदा, जो परिचित से व्यक्ति का भार लिए हुए सबको मौन किए हुए था। सावन का मोसम पर्वतों को जान दे रहा था। बरसात का पानी,सड़कों की गर्मी को धुआ बना कर हवा में उछाल रहा है। साहिल  आज दोपहर की शिफ़्ट के लिए जा रहा है। अपने भविष्य को बेहतर बनाने की चाह आज उसको और उसके मन को बार बार याद कर रही है। “वह आज से अपने गोल पर फ़ोकस करेगा” और “तुम यह कर सकते हो” के नारे आज उसके भीतर गूंज रहे है और प्रायः यही नारे गूंजते ही रहते है । वह चाहता है कि वो इस “जंजाल” से बाहर निकले, पर कोई और बेहतर उपाय नही है सिवाय “इसके बारे में न सोचने के” । सीढ़ी पर तीसरा कदम ही रखा था कि उसके कान में कुछ स्वर सुनायी पड़े “दिस सटेरस ओन्ली यूज़ फ़ोर ऑफ़िसर”...

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