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मोबाइल महाविनाश

  मोबाइल के दुष्परिणाम पर कविता मोबाइल आया जीवन में, लाया संग सुविधा, पर इसका दुरुपयोग बने, अब एक बड़ी विपदा। हर पल बस स्क्रीन पे, नजरें गड़ी रहें, सामने जो हैं पास में, उनसे दूरियाँ बढ़ें। बचपन खो रहा है अब, गेम्स की दुनिया में, कहाँ गए वो खेल खुले, मैदानों की छाया में। माँ-बाप की गोदी छूटी, किताबें भी रूठीं, मोबाइल की जादूगरी ने, नींव तक को लूटी। संध्या की बातों को, अब चैट ने खा लिया, आंखों की रोशनी को, नीली रौशनी ने छीन लिया। रिश्ते हो गए डिजिटल, अपनापन अब कहाँ? दिलों की गर्माहट में, आ गया है अब धुआँ। सोते-जागते मोबाइल, खाने में भी साथ, इंसान अब मशीन बना, छूट गई सौगात। बचो इससे जितना हो, साधन है ये बस, वरना जीवन हो जाएगा, खाली और निष्कलुष।

गरीब किसान पर कविता

किसान है वो, जो खेतों में मेहनत करता, सूरज की किरण से लेकर रात तक काम करता। पसीना उसकी मुसीबतों का गवाह बनता, लेकिन फिर भी उसका चेहरा कभी नहीं बुझता। धरती मां का बेटा, खेतों का राजा, लेकिन गरीबी ने उसे किया है सजा। उम्र भर की मेहनत, नसीब ने लूटी, फिर भी वो अपने खेतों में मेहनत से जीता है रोज़ की। न हाथ में पैसे, न घर में सुख-चैन, मगर दिल में है उम्मीद का एक प्याला पैन। कभी बारिश तो कभी सूखा, उसका साथी बनता, फिर भी उसकी उम्मीद कभी नहीं डगमगाता, वह लड़ता। रात के अंधेरे में, सोते समय भी सोचता, क्या होगा अगले दिन, ये सवाल हर रोज़ पूछता। क्या फसल उगाए, क्या बीज बोए, हर कदम पर वह डरता, फिर भी सब कुछ खोए। न घर में सुख है, न रोटी का ठिकाना, वो किसान फिर भी नहीं खोता अपना इरादा। अपने बच्चों के लिए, खेतों में जान लुटा देता, उनकी हंसी की आवाज़ में अपना सपना बसा देता। मौसम कभी नहीं करता, किसान से कोई वादा, कभी तो सोने की उम्मीद, कभी सेब की बगिया। लेकिन फिर भी वो उठता है हर सुबह, खेतों में काम करने के लिए, न थकता है, न रुकता है। गरीबी में जीता हुआ, पर हिम्मत से बढ़ता, राहों ...

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