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सूर्यास्त का दृश्य

सूर्यास्त के समय पृथ्वी  सोने के थाल में आग के फूल सजाकर  सप्तरंगी होली खेल रही हो  तब रंगों की बौछार मानो  चारो ओर बिखर रही हो  पृथ्वी के नयन पर  काजल की कोर उकेर रहे दी हो  सूर्यास्त के समय...... चारों ओर नीरव शांति फैल रही  दूर कहीं ............... आकाश में पक्षियों का झुंड  पंखों की फड़फड़ाहट से  आकाश में मधुर ध्वनि फैला रहे हो  इसी समय............  समुंद्र भी शीतल हवा से  पृथ्वी के तृप्त-हृदय में शीतलता भेंट कर रही हो।  पूरे भारतवर्ष की.........  थकी-हारी किरणे विश्राम कर ही हो  दूर कहीं से.......  गाय अपनी मंद-मंद गति से  घर की ओर प्रस्थान कर रही हो इसी समय दूर कहीं से उड़ते हुए पक्षियों के झुंड का सरस कोलाहल सूर्यास्त का विदाई गीत गा रहा हो आसमान में उड़ती हुई रज-कण केसर कणो के समान प्रतीत हो रही है प्रकृति मानो शांति का अभिषेक कर रही हो 

पाथेय

दिन-भर के कार्यों के बोझ में दबा  आधुनिकता की अंधी-दौड़ से हारा  मल्टी-मीडिया की  चकाचौंध से घबराया  रोजी-रोटी की  भागम-भाग से परेशान  सुख-सुविधा का लालायित  पथिक ..... जब घर लौटता है तो पाथेय बना सूर्यास्त का सुरज  उसकी सारी थकान को  चूर-चूर कर देता है आसमान पर छाई लालिमा  मानो पथिक की रगों में  खून का संचार कर रही हो पक्षीओ का कलरव मानो मन को सुकून दे रहा हो दूर क्षितिज पर  धरती-अंबर का स्नेह मिलन  मानो उसके लिए कोई उत्सव हो प्रकृति का यह सुन्दर चित्रण  पथिक का पाथेय बना हो। पथिक-शंकर नाथ,धीरदेसर

मानवता का विनाश

मोबाइल की दुनिया में उलझा है मानव, भूल गया संबंधों का प्यारा संगम। पलकों में स्क्रीन, दिल में है शोर, चुपचाप जी रहा, पर भीतर है तोड़। न सोशल है अब सोशल मीडिया, बस दिखावा, जलन और पीड़ा। हर क्षण क्लिक, हर भाव ऑनलाइन, पर मन के रिश्ते हो गए ऑफलाइन। टीवी, गेम्स, रील्स का जाल, बचपन से छीन लेता खुशहाल। नेत्र थके, मन भी भ्रमित है, सपनों का संसार भी सीमित है। पढ़ने की आदत हो गई बेमानी, ज्ञान अब खोजता एक झलक पानी। मस्तिष्क थक गया दिखावे की रट से, भूल गए सच्चाई, खो गए हक से। कला थी जो, अब उपकरण बनी, मनोरंजन की जगह व्यसन बनी। मल्टीमीडिया की इस तेज़ रफ़्तार में, मानवता खो रही अपने आधार में। संकेत है ये समय का, जागो अब मानव, तकनीक को साधन बनाओ, न बनाओ दानव।

अंतरिक्ष यात्री शुभांशु (एक प्रेरणादायक कविता)

  अंतरिक्ष यात्री शुभांशु (एक प्रेरणादायक कविता) चाँद सितारों की खोज में निकला, धरती का बेटा, सपनों से पला। नाम है उसका 'शुभांशु' वीर, आकाश को छूना था उसका अधीर। छोटे गाँव की गलियों से आया, ज्ञान की लौ में खुद को जलाया। किताबों में देखा उसने गगन, सोचा — क्यों न पहुँचूँ उस अम्बर तक मैं मगन। धरती को छोड़ा, नभ को चूमा, अंतरिक्ष को पहली बार उसने छुआ। नेत्रों में चमक, दिल में भरोसा, विज्ञान था उसका सबसे बड़ा साथी और संकल्पित टोसा। शून्य गुरुत्व में भी संतुलन पाया, तारों की भाषा को समझ कर आया। संदेश लाया मानवता के लिए, “संभव है सब कुछ — बस हो नीयत सच्ची और दिशा सही लिए।” अब लौट आया वो धरती पर फिर, बचपन के आँगन में है वही ताजगी और नीर। पर अंतर में है अब एक नया ज्ञान, कि सीमाएँ टूटती हैं, जब इरादा हो महान। — जय हो शुभांशु, अंतरिक्ष का पथिक, तेरे जैसे सपनों से ही जग बने अधिक विकसित

ऋतु परिवर्तन

खुशबू की चादर लपेटे, आता बसंत का संदेश, पेड़ों पर नयी कोपलें, धरती पर हरित वेश। कोयल की मीठी कुहू, गूँज उठे हर गली, प्रकृति मुस्कुराती है, जैसे नयी कलि खिली। गर्मी की तपती धूप, सूरज का तेज प्रखर, सूरजमुखी हँसता है, खेतों में दिखता असर। आम की मीठी महक, लहराये आम्र वृक्ष, गर्मी में भी खिलखिलाता, प्रकृति का अनुपम कक्ष। बरखा के बादल छाये, जलधाराएं झरझर, धरती की प्यासी गोद, हरियाली से भर भर। मेंढक की टर्र-टर्र, मिट्टी से खुशबू आयी, धूल भरे पत्तों पर, बूंदों ने जादू छुपाई। पतझड़ की चुप्पी संग, पेड़ों की शाखें उदास, पत्तों की विदाई में, हवा का मधुर प्रयास। धूप हल्की-हल्की, सन्नाटा गहराये, प्रकृति के इस शून्य में, फिर से नयी ऋतु आये। हर मौसम एक कहानी, जीवन की ये पहचान, परिवर्तन की लय में, छुपा है जीवन महान। नए फूल, नई बयार, संग बहते ये मौसम, सिखलाते निरंतरता, हर पल है उत्सव अनुपम।

इंसानियत

इंसानियत विश्वास-निर्झर बह गया  बंजर ज्यो तन रह गया सूख गई मानवता की डाली बजा रहा है अब दानव ताली जीवन-शीर्ण हो गई इंसानियत की लाली मानव ने मानव का संहार किया कभी एटम बम से तो  कभी (कोरोना वायरस)जैविक बम से मानवता पर प्रहार किया खत्म हो गया विश्वास जगत में फैल रहा तिमीर वतन में ठूंठ तो हो गया मानव देखो उतर गया पानी मानव तन से इंसानियत देखो तड़पा रही ईर्ष्या सब जन को खाये जा रही मानवता तड़पा रही Shankar nath Dheerdesar,near bharat mala project,Pallu, hanumangarh,rajsthan,india Manwta hospital nasik

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