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गरीबी और बचपन

 गरीबी और बचपन मेरे बचपन की राहों में  बचपन गुजर रहा है केवल  ख्वाबों और निगाहों में  मेरे साथी खड़े हैं खेल के मैदानों में  मैं देखता हूं केवल उनको  कितने खुशनसीब हैं वे सब लोग  बीच मैदानों में भागते,दौड़ते,खिलखिलाते हैं  परंतु कभी-कभी सोचता हूं  कितने स्वार्थी हैं वे सब लोग  न कभी बुलाते न कभी खिलाते  और ना ही कभी बचपन में साथ निभाते  मैं गरीब हूं तो क्या हुआ  मेरा भी तो मन चाहता है  मैं खेलूं मैं कुदू मैं खिलखिलाऊ पर यह गरीबी है निगोड़ी  मेरा सब कुछ छीन लिया  न खेलने देती,न हंसने देती, न जिंदगी में खुशियां देती (एक गरीब बच्चे के जीवन पर समर्पित कविता)  लेखक: शंकर नाथ 

अध्यापक की पुकार(कविता)

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अध्यापक की पुकार अजीब सी बेचैनी बना रखी है जीवन के हर कोने में कहां मिलता है सुख खाली पड़ी स्कूलों में बहुत कोशिश करते हैं दुनिया को कोरोना से बचाने की पर कोरोना है दुश्मन वह लगा है जीवन की हस्ती मिटाने पर पर सुन रे कोरोना.............................. हम बच्चों से दूर भले ही हैं पर दुआ साथ हैं बच्चों की हस्ती नहीं मिटेगी हमारी दुनिया में एक लंबे दौर तक आखिर में स्कूल भी खुलेगी उन्ही स्कूलों में बच्चे भी खिलखिलाएंगे माना कि साथ नहीं देती है -प्रकृति रोज बिगड़ता है रूप इसका हमें अफसोस नहीं इस कुरूप का हमें आशा है एक सुख भरे दिन की बच्चे भी आयेंगे,वो गीत भी गायेंगे झोंक देंगे हम सब ताकत अपनी बच्चों को पढ़ाने में...........................                          अध्यापक की कलम                            शंकर नाथ धीरदेसर                          रा.बा.मा.वि.अलीपुरा ...

मैं समय हूं।(कविता)

🕒🕒🕒🕒🕒 मैं समय हूं मैं निरंतर चलता हूं कभी रुकता नहीं कभी झुकता नही कभी थकता नहीं..... एक ही गति है मेरी कभी ठहरा सा लगता हूं तो कभी भागता प्रतीक होता हूं। कभी सुख के साथ तो कभी दुख के साथ कभी हंसाता हूं तो कभी रुलाता हूं मै ही तुझे जगाता हूं मैं ही तो तुझे सुलाता हूं मेरी कीमत मैं नहीं जानता जानने वाला भी तू ही है कभी तू मुझे भगाता है तो कभी मैं तुझे भगाता हूं। कभी मोहमाया के जाल में फंसाता हूं। न तो कोई मेरी गति समझ पाया और नहीं मेरा कोई कर्म मैं देखता हूं कि इस संसार में मानव ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो इस सांसारिक मोह माया के जाल में फंस जाता है और मछली की तरह छटपटाता है। यह उनके बुरे कर्मों का ही प्रतिफल है। यह अभिशाप ही उनका परिणाम है हे मानव प्राणी.... अभी भी मैं यही रुका हूं तू मुझे समझ तू मेरे साथ चल तेरा कल्याण होगा।     शंकर नाथ धीरदेसर       वरिष्ठ अध्यापक

मैं शब्द हूं(कविता)

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मैं शब्द हूं तोड़ो-मरोड़ो पर सार्थक हूं तो अर्थ देता हूं निरर्थक हूं तो अनर्थ कर देता हूं मेरा वजूद पूरी दुनिया है पूरी दुनिया मुझ में लय है मैं पूरी दुनिया में लय हूं मैं बच्चा हूं ना समझ और मासूम हूं मुझे भावों में पिरोलो और एहसासों में संजोलो तो जीवन आसान बना देता हूं मेरे से ही तो बच्चे-बूढ़े की पहचान होती है मैं ही हूं जिससे समझ-नासमझ का श्रृंगार मिलता है मुझको संभल कर काम में लेना वरना बना बनाया काम बिगाड़ देता हूं मेरे(शब्दों) से ही तो खुशी और गम का एहसास होता है मेरे(शब्दों) में ही तो सूरत और बे-सूरत का श्रृंगार होता है Shankar nath

"सरस्वती-सदन"(कविता)

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"सरस्वती-सदन"(कविता) विद्यादायिनी का वरदान सदन में शिक्षा की बहती रसधार वतन में माता-पिता जैसा व्यवहार सदन मे बच्चों को मिलता प्यार जगत में एमडीएम का मिट्ठा स्वाद सदन में बच्चो के सर्वांगीण विकास बदन मे प्रार्थना सभा में संगीत सदन में बच्चों का लहराता राग गगन में गुरुजनों का आशीर्वाद सदन में संस्कारों का गुणगान मनन में अनुशासन का सम्मान सदन में अध्यापकों का फैला प्यार चमन में गुरु-शिष्य संम्बन्धो की प्रगाढता सदन में सब रिश्तो का आदरभाव ज़हन में पुस्तकों का आदर-भाव सदन में गुणीजनों का गुणगान है उनमे     शंकर नाथ हनुमानगढ़             

"हिन्दी भाषा की ताकत"

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हिन्दी भाषा की ताकत भारत का प्रकाश है इसमें जन-जन की पुकार है इसमें भारतीयों का प्यार है इसमें राष्ट्रभाषा की दरकार है इसमें समरसता का सार है इसमें अखंडता का भार है इसमें संस्कारों की भरमार है इसमें चेतना की पुकार है इसमें गरीबों की सरकार है इसमें राष्ट्रप्रेम की दरकार है इसमें संस्कृति की झलक इसमें भ्रातृत्व की भावना है इसमें आर्यों की सद्भावना है इसमें नाथ-सिद्धों की छाप इसमें जैनों-साहित्य की बात है इसमें वीर रस की सौगात है इसमें श्रंगार रस की छाप है इसमें भक्ति  की रसधार है इसमें वात्सल्य का प्यार है इसमें छंदों की भरमार है इसमें व्याकरण की धार है इसमें संस्कृती का प्रचार है इसमें अत्याचारों का प्रतिकार है इसमें प्रेमचंद जैसे कलमकार है इसमें अपभ्रंश का सुधार है इसमें कबीर का विस्तार है इसमें लोक कल्याण का सार है इसमें (14 सितम्बर- हिन्दी दिवस की मंंगलकामनाएं)                   शंकर नाथ,धीरदेसर (हनुमानगढ़)                        वरिष्ठ अध्यापक ...

बच्चे हैं सबसे अच्छे

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छोटे-छोटे बच्चे  दिल के सच्चे बच्चे  बातों के पक्के बच्चे मन के थोड़े कच्चे                                   खेले- कूदे बच्चे                                   शोर मचाए बच्चे                                   सब बच्चे हैं अच्छे                                   रोज पढ़ते हैं बच्चे  नहाए बच्चे,खाए बच्चे  जग को हंसाये बच्चे मंद मंद मुस्काते बच्चे ककहरा गाते बच्चे                                  दादी के पोते बच्चे                          ...

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