सत्याग्रह बनाम सियासत
सत्ता की इस होड़ को देखो,
कैसे कैसे खेल रचाया है,
प्रतिद्वंदिता के चक्कर में,
जन-मन को भड़काया है।
सड़क-सड़क पर हैं विरोध,
झूठे नारों का शोर मचाया है,
लोकतन्त्र की मर्यादा पर,
जमके शोर मचाया।
अधिकारों की ढाल बना जब,
यह जन-आंदोलन का पथ,
सकारात्मक पक्ष जगाता है,
चेतना का ले पावन रथ।
गूँज उठी जब जनता की धुन,
सोई सत्ता जागती है,
शोषण,अत्याचार के आगे,
क्रांति-शिखा सुलगाई है।
अन्याय के विरुद्ध खड़े हो,
आवाज़ उठाना धर्म यहाँ,
जनहित के प्रश्नों पर सजती,
लोकतंत्र की गरिमा यहाँ।
पर सिक्के का दूजा पहलू,
काला साया लाता है,
जब राजनीतिक स्वार्थ में अंधा,
कोई इसे बनाता है।
सड़कों पर फिर आग लगती,
संपत्ति राख में ढलती है,
राजनीतिक रंजिश में केवल,
आम जनता ही जलती है।
काम-काज सब ठप हो जाते,
थमता विकास का हर पहिया,
घृणा और वैमनस्य बोती,
स्वार्थी नेताओं की नैया।
प्रतिद्वंदिता जब लांघे सीमा,
विरोध प्रदर्शन विष बनता है,
शांति भंग कर जन-जीवन को,
घोर निराशा में धकेलता है।
सत्य और अधिकार का साधन,
जब हिंसक मोड़ ले लेता है,
लोकतंत्र का सुंदर सपना,
तब रो-रोकर बद्दुआ देता है।
हो विरोध पर नीति-युक्त हो,
राष्ट्र-हित सर्वोपरि मानों,
राजनैतिक दांव-पेचों से ऊपर,
सत्य की शक्ति को जानों।
सकारात्मक पथ चुनकर ही,
समाज को दिशा मिलती है,
अहिंसा और संवाद से ही,
प्रगति की कली खिलेगी।
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